Tuesday, April 27, 2010

गर्मी है आई

















सूरज की चमक जब बहा दे पसीना,

हम सब कह उठते हैं गर्मी है आई।

छुट्टी की सुहानी सौगातें सब पाते हैं

इम्तहान के समय की हो गई बिदाई।

खेलों की दुनिया में यूँ हम खो जाते हैं

आपस में कभी नहीं होती लड़ाई।

बाहरी गर्मी का असर तन को तो होता है

पर मन की शीतलता को छू भी ना पाई।

कोई धूप से बचने के लिए ढूंढे जब छाया तो

हम सब कह उठते हैं गर्मी है आई।

2 comments:

माधव said...

पहली बार इस ब्लॉग पर आया हूँ , बहुत अच्छा लगा ये ब्लॉग , हम बच्चों के बारे में ये कविता और अच्छी और प्यारी लगी , आपके ब्लॉग पर नियमित रूप से आना पडेगा


http://madhavrai.blogspot.com/

khud ko pahachano said...

abhi to is garami ki bahut jarurat h thand se hath pair jam rahe h kah sakati hu garmi hai bhai