Monday, August 18, 2008

खेलो शतरंज खेलो

Sunday, July 27, 2008

ककहरा


‘ क ‘ से काम कर ,

‘ ख ‘ से खा मत ,

‘ ग ‘ से गीत सुना ,

‘ घ ‘ से घर की बात न करना , ङ खाली.

सोचो हम तक कैसे पहुँचे खुशहाली !

‘ च ‘ को सौंप चटाई ,

‘ छ ‘ ने छल छाया ,

‘ ज ‘ जंगल ने , ‘ झ ‘ का झण्डा फहराया ,

झगड़े ने ञ बीचोबीच दबा डाली ,

सोचो हम तक कैसे पहुँचे खुशहाली !

‘ ट ‘ टूटे , ‘ ठ ‘ ठिटके ,

यूँ ‘ ड ‘ डरा गया ,

‘ ढ ‘ की ढपली हम ,

जो आया , बजा गया.

आगे कभी न आई ‘ ण ‘ पीछे वाली,

सोचो हम तक कैसे पहुँचे खुशहाली !

---------------रचनाकार: रामकुमार कृषक

Saturday, July 19, 2008

करोड़पति बनने का इरादा है

Tuesday, July 15, 2008

भूतनाथ का बच्चा


एक बच्चा हमेशा रोता रहता था. कभी खूब चिल्ला के कभी सिर्फ आँसू बहा के. वह कभी रोने का कारण ही नहीं बताता था. लोग बहुत हँसाने, मनाने, समझाने की कोशिश करते थे, लेकिन उसपर कोई असर ही नहीं पड़ता था. पापा ने खिलौने लाके दिए, मम्मी ने गाने सुनाए, बड़े भाई ने कार्टून दिखाया, फिर भी उसपर कोई असर नहीं पड़ा. डाक्टर के पास ले गए. डाक्टर ने दवा लिख दी, दवा खिलाए गए. उसपर फिर भी कोई असर नहीं पड़ा. धीरे धीरे सब चिढ़ने लगे. अब वह ज्यादातर डाँट खाने लगा.
एक दिन जब वह सो रहा था, उसके सपने में भूतनाथ आए. पूछा-
"दोस्त, इतना रोता क्यों है?"
उसने कहा-
"भूत, मैंने तुम्हें टी.वी. में देखा था, तुम इतने अच्छे लगे, मैं तुम्हें अपने साथ रखना चाहता हूँ. तुम्हें ढूँढता रहता हूँ, तुम मिलते नहीं तो मैं क्या करूँ?"
भूतनाथ ने प्यार से समझाया-
"दोस्त, इस दुनिया में माता, पिता, भाई-बहन से अच्छा और प्यारा कुछ नहीं होता. मैं उन्हीं के दिलों में रहता हूँ. तुम सबसे मिलो, बातें करो, कहा मानों. वो जब भी जो भी करें, समझो मैं कर रहा हूँ."
इसी तरह की सारी बातें कर भूतनाथ चला गया. बच्चे ने कहा मान लिया. अब वह खुश रहने लगा.